ग़ज़ल 8

शेर 5

सफ़र हो शाह का या क़ाफ़िला फ़क़ीरों का

शजर मिज़ाज समझते हैं राहगीरों का

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पत्तों को छोड़ देता है अक्सर ख़िज़ाँ के वक़्त

ख़ुद-ग़र्ज़ी ही कुछ ऐसी यहाँ हर शजर में है

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किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का

जो धूप छाँव से रिश्ता बनाए रहता है

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पुस्तकें 1

Barwaqt

 

2010

 

चित्र शायरी 1

किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का जो धूप छाँव से रिश्ता बनाए रहता है

 

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