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अज़हर फ़राग़

1980 | बहावलपुर, पाकिस्तान

पाकिस्तान की नई पीढ़ी के मशहूर शायर, ‘मैं किसी दास्तान से उभरूँगा’ इनके काव्य संग्रह का नाम है

पाकिस्तान की नई पीढ़ी के मशहूर शायर, ‘मैं किसी दास्तान से उभरूँगा’ इनके काव्य संग्रह का नाम है

दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था

तालों की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था

दफ़्तर से मिल नहीं रही छुट्टी वगर्ना मैं

बारिश की एक बूँद बे-कार जाने दूँ

तेरी शर्तों पे ही करना है अगर तुझ को क़ुबूल

ये सुहुलत तो मुझे सारा जहाँ देता है

मैं जानता हूँ मुझे मुझ से माँगने वाले

पराई चीज़ का जो लोग हाल करते हैं

ये नहीं देखते कितनी है रियाज़त किस की

लोग आसान समझ लेते हैं आसानी को

जब तक माथा चूम के रुख़्सत करने वाली ज़िंदा थी

दरवाज़े के बाहर तक भी मुँह में लुक़्मा होता था

बता रहा है झटकना तिरी कलाई का

ज़रा भी रंज नहीं है तुझे जुदाई का

मिल गया तू मुझे मेरा नहीं रहने देगा

वो समुंदर मुझे क़तरा नहीं रहने देगा

उस से हम पूछ थोड़ी सकते हैं

उस की मर्ज़ी जहाँ रखे जिस को

अच्छे-ख़ासे लोगों पर भी वक़्त इक ऐसा जाता है

और किसी पर हँसते हँसते ख़ुद पर रोना जाता है

उसे कहो जो बुलाता है गहरे पानी में

किनारे से बंधी कश्ती का मसअला समझे

ये ए'तिमाद भी मेरा दिया हुआ है तुम्हें

जो मेरे मशवरे बे-कार जाने लग गए हैं

ख़तों को खोलती दीमक का शुक्रिया वर्ना

तड़प रही थी लिफ़ाफ़ों में बे-ज़बानी पड़ी

आँख खुलते ही जबीं चूमने जाते हैं

हम अगर ख़्वाब में भी तुम से लड़े होते हैं

कुछ नहीं दे रहा सुझाई हमें

इस क़दर रौशनी का क्या कीजे

हाए वो भीगा रेशमी पैकर

तौलिया खुरदुरा लगे जिस को

वो दस्तियाब हमें इस लिए नहीं होता

हम इस्तिफ़ादा नहीं देख-भाल करते हैं

ये ख़मोशी मिरी ख़मोशी है

इस का मतलब मुकालिमा लिया जाए

हम अपनी नेकी समझते तो हैं तुझे लेकिन

शुमार नामा-ए-आमाल में नहीं करते

किसी बदन की सयाहत निढाल करती है

किसी के हाथ का तकिया थकान खींचता है

वस्ल के एक ही झोंके में

कान से बाले उतर गए

ये कच्चे सेब चबाने में इतने सहल नहीं

हमारा सब्र करना भी एक हिम्मत है

एक ही वक़्त में प्यासे भी हैं सैराब भी हैं

हम जो सहराओं की मिट्टी के घड़े होते हैं

बहुत ग़नीमत हैं हम से मिलने कभी कभी के ये आने वाले

वगर्ना अपना तो शहर भर में मकान ताले से जाना जाए

ऐसी ग़ुर्बत को ख़ुदा ग़ारत करे

फूल भेजवाने की गुंजाइश हो

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

ज़रूर कोई हवाओं के कान खींचता है

एक होने की क़स्में खाई जाएँ

और आख़िर में कुछ दिया लिया जाए

बदल के देख चुकी है रेआया साहिब-ए-तख़्त

जो सर क़लम नहीं करता ज़बान खींचता है

ठहरना भी मिरा जाना शुमार होने लगा

पड़े पड़े मैं पुराना शुमार होने लगा

तेज़ आँधी में ये भी काफ़ी है

पेड़ तस्वीर में बचा लिया जाए

गीले बालों को सँभाल और निकल जंगल से

इस से पहले कि तिरे पाँव ये झरना पड़ जाए

हमारी मा'ज़रत ग़म कि मुस्कुरा रहे हैं

हम अपना हाथ तिरी पुश्त से हटा रहे हैं

ख़ुद पर हराम समझा समर के हुसूल को

जब तक शजर को छाँव के क़ाबिल नहीं किया

दलील उस के दरीचे की पेश की मैं ने

किसी को पतली गली से नहीं निकलने दिया

गिरते पेड़ों की ज़द में हैं हम लोग

क्या ख़बर रास्ता खुले कब तक

बहुत से साँप थे इस ग़ार के दहाने पर

दिल इस लिए भी ख़ज़ाना शुमार होने लगा

ये जो रहते हैं बहुत मौज में शब भर हम लोग

सुब्ह होते ही किनारे पे पड़े होते हैं

महसूस कर लिया था भँवर की थकान को

यूँही तो ख़ुद को रक़्स पे माइल नहीं किया

हमारे ज़ाहिरी अहवाल पर जा हम लोग

क़याम अपने ख़द-ओ-ख़ाल में नहीं करते

मेरी नुमू है तेरे तग़ाफ़ुल से वाबस्ता

कम बारिश भी मुझ को काफ़ी हो सकती है

ये लोग जा के कटी बोगियों में बैठ गए

समय को रेल की पटरी के साथ चलने दिया

वैसे तो ईमान है मेरा उन बाँहों की गुंजाइश पर

देखना ये है उस कश्ती में कितना दरिया जाता है

इज़ाला हो गया ताख़ीर से निकलने का

गुज़र गई है सफ़र में मिरे क़याम की शाम

मंज़र-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ है दम-ए-रुख़्सत-ए-ख़्वाब

ताज़िए की तरह उट्ठा है कोई बिस्तर से