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अज़हर नैयर

1945 | दरभंगा, भारत

शायर, कथाकार

शायर, कथाकार

अज़हर नैयर

ग़ज़ल 13

अशआर 5

तुम बहर-ए-मोहब्बत के किनारे पे खड़े थे

तुम ने मिरी आँखों में समुंदर नहीं देखा

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ब-वक़्त-ए-शाम समुंदर में गिर गया सूरज

तमाम दिन की थकन से निढाल ऐसा था

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दिल ख़ाक हुआ प्यार की इस आग में जल कर

और झाँक के उस ने कभी अंदर नहीं देखा

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थी उस की बंद मुट्ठी में चिट्ठी दबी हुई

जो शख़्स था ट्रेन के नीचे कटा हुआ

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चाहा है जिस का साया शजर वो बबूल है

क़िस्मत में मेरे आज भी सड़कों की धूल है

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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