ग़ज़ल 7

शेर 4

इक क़िस्सा-ए-तवील है अफ़्साना दश्त का

आख़िर कहीं तो ख़त्म हो वीराना दश्त का

मैं टूटने देता नहीं रंगों का तसलसुल

ज़ख़्मों को हरा करता हूँ भर जाने के डर से

देखूँ वो करती है अब के अलम-आराई कि मैं

हारता कौन है इस जंग में तन्हाई कि मैं

भटक रहा हूँ मैं इस दश्त-ए-संग में कब से

अभी तलक तो दर-ए-आईना खुला मिला

पुस्तकें 1

Abdur Raheem Khan Khanan Aur Unke Dohe

 

1968

 

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