Haseeb Soz's Photo'

हसीब सोज़

बदायूँ, भारत

ये बद-नसीबी नहीं है तो और फिर क्या है

सफ़र अकेले किया हम-सफ़र के होते हुए

ये इंतिक़ाम है या एहतिजाज है क्या है

ये लोग धूप में क्यूँ हैं शजर के होते हुए

यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है

कई झूटे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है

वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया

लिबास पहने रहा और बदन उतार गया

मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को

बाज़ लोगों ने तो बीमार समझ रक्खा है

तू एक साल में इक साँस भी जी पाया

मैं एक सज्दे में सदियाँ कई गुज़ार गया

तेरे मेहमाँ के स्वागत का कोई फूल थे हम

जो भी निकला हमें पैरों से कुचल कर निकला

दर-ओ-दीवार भी घर के बहुत मायूस थे हम से

सो हम भी रात इस जागीर से बाहर निकल आए