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इमरान-उल-हक़ चौहान

इमरान-उल-हक़ चौहान के शेर

ख़्वाब, उम्मीद, तमन्नाएँ, तअल्लुक़, रिश्ते

जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे

हार ही जीत है आईन-ए-वफ़ा की रू से

ये वो बाज़ी है जहाँ जीत के हारे सारे

क्या जाने शाख़-ए-वक़्त से किस वक़्त गिर पड़ूँ

मानिंद-ए-बर्ग-ए-ज़र्द अभी डोलता हूँ मैं

वक़्त हर ज़ख़्म को भर देता है कुछ भी कीजे

याद रह जाती है हल्की सी चुभन की हद तक

रंग हो रौशनी हो या ख़ुशबू

सब में परतव उसी हसीं के हैं

अपने लहू में ज़हर भी ख़ुद घोलता हूँ मैं

सोज़-ए-दरूँ किसी पे नहीं खोलता हूँ मैं

अजीब ख़ौफ़ का मौसम है इन दिनों 'इमरान'

सुगंध ले के हवा दूर तक नहीं जाती

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Jashn-e-Rekhta | 8-9-10 December 2023 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate - New Delhi

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