इशरत आफ़रीं

ग़ज़ल 39

नज़्म 38

अशआर 13

भूक से या वबा से मरना है

फ़ैसला आदमी को करना है

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अकेले घर में भरी दोपहर का सन्नाटा

वही सुकून वही उम्र भर का सन्नाटा

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शाम को तेरा हँस कर मिलना

दिन भर की उजरत होती है

लड़कियाँ माओं जैसे मुक़द्दर क्यूँ रखती हैं

तन सहरा और आँख समुंदर क्यूँ रखती हैं

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तेरा नाम लिखती हैं उँगलियाँ ख़लाओं में

ये भी इक दुआ होगी वस्ल की दुआओं में

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

इशरत आफ़रीं

इशरत आफ़रीं

इशरत आफ़रीं

Ishrat Afreen in Jashn e Nida Fazli 2010

इशरत आफ़रीं

ख़ुश्बू संदल और न गहना दुख देगा

इशरत आफ़रीं

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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