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जुनैद हज़ीं लारी

1933 | बनारस, भारत

ग़ज़ल 3

 

शेर 15

देखा नहीं वो चाँद सा चेहरा कई दिन से

तारीक नज़र आती है दुनिया कई दिन से

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क़तरा हो तो बहर आए वजूद में

पानी की एक बूँद समुंदर से कम नहीं

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वो सादगी में भी है अजब दिलकशी लिए

इस वास्ते हम उस की तमन्ना में जी लिए

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कभी इस राह से गुज़रे वो शायद

गली के मोड़ पर तन्हा खड़ा हूँ

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इश्क़ है जी का ज़ियाँ इश्क़ में रक्खा क्या है

दिल-ए-बर्बाद बता तेरी तमन्ना क्या है

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पुस्तकें 1

Harf-o-Nawa

 

1985

 

चित्र शायरी 1

इश्क़ है जी का ज़ियाँ इश्क़ में रक्खा क्या है दिल-ए-बर्बाद बता तेरी तमन्ना क्या है

 

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