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कबीर अजमल

1967 - 2020 | बनारस, भारत

ग़ज़ल 15

शेर 15

ज़मीर ज़ेहन में इक सर्द जंग जारी है

किसे शिकस्त दूँ और किस पे फ़त्ह पाऊँ मैं

लहू रिश्तों का अब जमने लगा है

कोई सैलाब मेरे घर भी आए

कुछ तअल्लुक़ भी नहीं रस्म-ए-जहाँ से आगे

उस से रिश्ता भी रहा वहम गुमाँ से आगे

पुस्तकें 1

Muntashir Lamhon Ka Noor

 

2007

 

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