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मख़मूर जालंधरी

1915 - 1985 | जालंधर, भारत

मख़मूर जालंधरी

ग़ज़ल 14

नज़्म 4

 

अशआर 3

ये फ़ैज़-ए-इश्क़ था कि हुई हर ख़ता मुआफ़

वो ख़ुश हो सके तो ख़फ़ा भी हो सके

मौजूदगी-ए-जन्नत-ओ-दोज़ख़ से है अयाँ

रहमत है एक बहर मगर बे-कराँ नहीं

गो उम्र भर मिल सके आपस में एक बार

हम एक दूसरे से जुदा भी हो सके

 

पुस्तकें 34

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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