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मनोज अज़हर

1978 | मुरादाबाद, भारत

ग़ज़ल 2

 

नज़्म 1

 

शेर 2

यूँ चार दिन की बहारों के क़र्ज़ उतारे गए

तुम्हारे बअ'द के मौसम फ़क़त गुज़ारे गए

रात बे-सुध हो के सोएगी यहाँ

इस लिए सूरज ने पर्दा कर लिया

 

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