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मिन्हाज ख़ान

2006 | उन्नाव, भारत

मिन्हाज ख़ान

ग़ज़ल 18

अशआर 5

उन की तहज़ीब हो गई रुख़्सत

तुझ से फेरें हैं जो नज़र उर्दू

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दिल तड़प जाता है जिस दम याद जाते हैं आप

आप से बिछड़े हमें कितने ज़माने हो गए

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पहले तो ख़ुद को दफ़्न किया अपनी क़ब्र में

फिर अपना मर्सिया भी सुनाना पड़ा मुझे

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बेवक़ूफ़ अपने को कहते हुए बाहर निकले

जब वहाँ सब थे समझदार तो हम क्या करते

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मेरी उम्मीदों के जितने थे शजर सूख गए

जब किसी और से जा कर वो मिला शाम के बा'द

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