aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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मोहम्मद असदुल्लाह

1958 | नागपुर, भारत

मोहम्मद असदुल्लाह के शेर

इक दनदनाती रेल सी उम्रें गुज़र गईं

दो पटरियों के बीच वही फ़ासले रहे

महक उठी है फ़ज़ा पैरहन की ख़ुशबू से

चमन दिलों का खिलाने को ईद आई है

जाते बरस तुझ को सौंपा ख़ुदा को

मुबारक मुबारक नया साल सब को

आब-दीदा हूँ मैं ख़ुद ज़ख़्म-ए-जिगर से अपने

तेरी आँखों में छुपा दर्द कहाँ से देखूँ

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