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मुख़्तार सिद्दीक़ी

1919 - 1972

ग़ज़ल 13

शेर 11

मेरी आँखों ही में थे अन-कहे पहलू उस के

वो जो इक बात सुनी मेरी ज़बानी तुम ने

इबरत-आबाद भी दिल होते हैं इंसानों के

दाद मिलती भी नहीं ख़ूँ-शुदा अरमानों की

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बस्तियाँ कैसे मम्नून हों दीवानों की

वुसअ'तें इन में वही लाते हैं वीरानों की

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कभी फ़ासलों की मसाफ़तों पे उबूर हो तो ये कह सुकूँ

मिरा जुर्म हसरत-ए-क़ुर्ब है तो यही कमी यहाँ सब में है

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नूर-ए-सहर कहाँ है अगर शाम-ए-ग़म गई

कब इल्तिफ़ात था कि जो ख़ू-ए-सितम गई

पुस्तकें 2

Jine Ki Ahmiyat

 

 

Manzil-e-Shab

 

1955

सी हरफ़ी

 

 

 

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