नसीम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल 5
अशआर 4
रौशन भी हमी से रही तक़दीर हमारी
और अपने मुक़द्दर की सियाही भी हमीं थे
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
रस्ता भी हमी लोग थे राही भी हमीं थे
और अपनी मसाफ़त की गवाही भी हमीं थे
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
क़ुमक़ुमों की आँच ने पिघला दिए मंज़र तमाम
चाँद अब कोई किसी भी बाम पर मिलता नहीं
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
मस्लहत का ये कफ़न रखता है बे-दाग़ हमें
अहल-ए-ईमान हैं हम-रंग से डर लगता है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
अन्य शायरों को पढ़िए
-
यूसुफ़ हसन
-
फ़ारूक़ शमीम
-
अख़्तर शाहजहाँपुरी
-
जाँ निसार अख़्तर
-
अकबर इलाहाबादी
-
अंजुम आज़मी
-
असरार-उल-हक़ मजाज़
-
शाद फ़िदाई देहलवी
-
नुसरत ग्वालियारी
-
अमीर मीनाई
-
ज़ुहैर कंजाही
-
मोहम्मद अहमद रम्ज़
-
हलीम साबिर
-
आनन्द पांडेय तन्हा
-
ज़ुल्फ़ेक़ार अहमद ताबिश
-
निकहत बरेलवी
-
शमीम अब्बास
-
सफ़दर हमदानी
-
इफ़्तिख़ार आरिफ़
-
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा