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सय्यद अमीन अशरफ़

1931 | अलीगढ़, भारत

अग्रणी आधुनिक शायरों में विख्यात।

अग्रणी आधुनिक शायरों में विख्यात।

सय्यद अमीन अशरफ़

ग़ज़ल 57

शेर 15

है ता-हद्द-ए-इम्काँ कोई बस्ती बयाबाँ

आँखों में कोई ख़्वाब दिखाई नहीं देता

इक चाँद है आवारा-ओ-बेताब फ़लक-ताब

इक चाँद है आसूदगी-ए-हिज्र का मारा

लज़्ज़त-ए-दीद ख़ुदा जाने कहाँ ले जाए

आँख होती है तो होता नहीं क़ाबू दिल पर

किसी से इश्क़ हो जाने को अफ़्साना नहीं कहते

कि अफ़्साने मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार होते हैं

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जिसे ना-ख़्वाब कहते हैं उसी को ख़्वाब कहते हैं

तमीज़-ए-ख़ैर-ओ-शर में नुकता-ए-सद-मोतबर क्या है

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पुस्तकें 7

Bahar-e-Ijad

 

2007

Barg-o-Baar

 

2012

Jada-e-Shab

 

2000

Jada-e-Shab

 

2012

Qafas-e-Rang

 

2011

Shumara Number-000

1961

अलीगढ़ मैगज़ीन

Salnama

1961

 

ऑडियो 4

किसी ख़याल की रौ में था मुस्कुराते हुए

पेच-दर-पेच सवालात में उलझे हुए हैं

मुनव्वर और मुबहम इस्तिआरे देख लेता हूँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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