कल तिरे एहसास की बारिश तले

मेरा सूना-पन नहाया देर तक

मिरी प्यास का तराना यूँ समझ सकेगा

मुझे आज सुन के देखो मिरी ख़ामोशी से आगे

ज़ख़्म भी अब हसीन लगते हैं

तेरे हाथों फ़रेब खाने पर

कैसे होती है शब की सहर देखते

काश हम भी कभी जाग कर देखते

मारो पत्थर भी तो नहीं हिलता

जम चुका है अब इस क़दर पानी

हसरत-ए-मौसम-ए-गुलाब हूँ मैं

सच हो पाएगा वो ख़्वाब हूँ मैं

तिरे वजूद को छू ले तो फिर मुकम्मल हो

भटक रही है ख़ुशी कब से दर-ब-दर मुझ में