क़मर जमील के शेर

अपनी नाकामियों पे आख़िर-ए-कार

मुस्कुराना तो इख़्तियार में है

या इलाहाबाद में रहिए जहाँ संगम भी हो

या बनारस में जहाँ हर घाट पर सैलाब है

हम सितारों की तरह डूब गए

दिन क़यामत के इंतिज़ार में है

एक पत्थर कि दस्त-ए-यार में है

फूल बनने के इंतिज़ार में है