सबीहा सबा के शेर

कोई मसरूफ़ियत होगी वगर्ना मस्लहत होगी

इस पैमाँ-फ़रामोशी से उस को बेवफ़ा कहना

सजा कर चार-सू रंगीं महल तेरे ख़यालों के

तिरी यादों की रानाई में ज़ेबाई में जीते हैं