ग़ज़ल

ख़ूबियों को मस्ख़ कर के ऐब जैसा कर दिया

साबिर

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

साबिर

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में

साबिर

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशिर से रहते हैं

साबिर

सच यही है कि बहुत आज घिन आती है मुझे

साबिर

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

हमारी बेचैनी उस की पलकें भिगो गई है

साबिर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI