ग़ज़ल 12

शेर 14

तिरे तसव्वुर की धूप ओढ़े खड़ा हूँ छत पर

मिरे लिए सर्दियों का मौसम ज़रा अलग है

रखे रखे हो गए पुराने तमाम रिश्ते

कहाँ किसी अजनबी से रिश्ता नया बनाएँ

सारे मंज़र हसीन लगते हैं

दूरियाँ कम हों तो बेहतर है

पुस्तकें 2

दीवान-ए-साबिर

 

 

रायगाँ

 

1972

 

ऑडियो 7

ख़ूबियों को मस्ख़ कर के ऐब जैसा कर दिया

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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