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साबिर

1975 - | औरंगाबाद, भारत

ग़ज़ल 12

शेर 14

उस के शर से मैं सदा माँगता रहता हूँ पनाह

इसी दुनिया से मोहब्बत भी बला की है मुझे

ये क्या बद-मज़ाक़ी है गर्द झाड़ते क्यूँ हो

इस मकान-ए-ख़स्ता में यार हम भी रहते हैं

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

आज-कल बाज़ार में मंदी है सस्ता है अभी

ऑडियो 7

ख़ूबियों को मस्ख़ कर के ऐब जैसा कर दिया

तुम्हारे आलम से मेरा आलम ज़रा अलग है

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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