Sandeep Gupte's Photo'

संदीप गुप्ते

1961 | भोपाल, भारत

14
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

दुल्हन की मेहंदी जैसी है उर्दू ज़बाँ की शक्ल

ख़ुशबू बिखेरता है इबारत का हर्फ़ हर्फ़

ग़ज़ल में जब तलक एहसास की शिद्दत हो शामिल

फ़क़त अल्फ़ाज़ की कारीगरी महसूस होती है

उस से मेरा कोई रिश्ता निकला

मेरे जैसा वो भी तन्हा निकला

फिर एक बार गुनाहों से हम ने की तौबा

फिर एक बार किया हम ने अपना काम शुरूअ'

कोई हयात के मअ'नी बता के समझाए

तवील क्या है भला मुख़्तसर का क्या मतलब

हमें क़ुबूल नहीं छोटा मुँह बड़ी बातें

मिसाल बनते हैं और फिर मिसाल देते हैं

मोहब्बत तो किसी से कर पाए

किसी से तुम शिकायत क्या करोगे

कोई भी शख़्स दुनिया में तुम्हें छोटा नज़र आए

तुम अपने सोचने का दायरा इतना बड़ा कर लो

हम एहतियात की ऐसी मिसाल देते हैं

तुम्हारा ज़िक्र भी आया तो टाल देते हैं

तू कहाँ रहती है पूछा था किसी ने एक दिन

मैं ग़मों के साथ रहती हूँ ख़ुशी कहने लगी

आँधियाँ आईं उठा कर ले गईं सब बस्तियाँ

मैं ने इक दिल में बनाया था मकाँ अच्छा हुआ

मैं तुम्हारे शहर की तहज़ीब से वाक़िफ़ था

पत्थरों से की नहीं थी गुफ़्तुगू पहले कभी