noImage

सरफ़राज़ दानिश

1942 | भोपाल, भारत

सरफ़राज़ दानिश

ग़ज़ल 5

 

अशआर 7

ग़म का सूरज तो डूबता ही नहीं

धूप ही धूप है किधर जाएँ

रात की सरहद यक़ीनन गई

जिस्म से साया जुदा होने लगा

शहर भर के आईनों पर ख़ाक डाली जाएगी

आज फिर सच्चाई की सूरत छुपा ली जाएगी

तिलिस्म तोड़ दिया इक शरीर बच्चे ने

मिरा वजूद उदासी का इस्तिआरा था

हमारा शेर भी लौह-ए-तिलिस्म है शायद

हर एक रुख़ से हमें बे-नक़ाब करता है

  • शेयर कीजिए

पुस्तकें 2

 

ऑडियो 5

आरज़ूओं की रुतें बदले ज़माने हो गए

इस से पहले कि सर उतर जाएँ

लम्हा लम्हा तजरबा होने लगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

"भोपाल" के और शायर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

Jashn-e-Rekhta | 2-3-4 December 2022 - Major Dhyan Chand National Stadium, Near India Gate, New Delhi

GET YOUR FREE PASS
बोलिए