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सरफ़राज़ दानिश

1942 | भोपाल, भारत

ग़ज़ल 5

 

शेर 7

ग़म का सूरज तो डूबता ही नहीं

धूप ही धूप है किधर जाएँ

रात की सरहद यक़ीनन गई

जिस्म से साया जुदा होने लगा

शहर भर के आईनों पर ख़ाक डाली जाएगी

आज फिर सच्चाई की सूरत छुपा ली जाएगी

तिलिस्म तोड़ दिया इक शरीर बच्चे ने

मिरा वजूद उदासी का इस्तिआरा था

चंद लम्हे को तू ख़्वाबों में भी कर झाँक ले

ज़िंदगी तुझ से मिले कितने ज़माने हो गए

पुस्तकें 1

अज़ान-ए-शेर

 

1998

 

ऑडियो 5

आरज़ूओं की रुतें बदले ज़माने हो गए

इस से पहले कि सर उतर जाएँ

लम्हा लम्हा तजरबा होने लगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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