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शहबाज़ ख़्वाजा

इंग्लैंड

ग़ज़ल 16

शेर 8

सफ़र का एक नया सिलसिला बनाना है

अब आसमान तलक रास्ता बनाना है

मुझे ये ज़िद है कभी चाँद को असीर करूँ

सो अब के झील में इक दाएरा बनाना है

मता-ए-जाँ हैं मिरी उम्र भर का हासिल हैं

वो चंद लम्हे तिरे क़ुर्ब में गुज़ारे हुए

इक ऐसा वक़्त भी सहरा में आने वाला है

कि रास्ता यहाँ दरिया बनाने वाला है

किसी ने देख लिया था जो साथ चलते हुए

पहुँच गई है कहाँ जाने बात चलते हुए

पुस्तकें 1

Aankh Khwab Bunti Hai

 

2005