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शारिब मौरान्वी

ग़ज़ल 14

शेर 3

सरों पे ओढ़ के मज़दूर धूप की चादर

ख़ुद अपने सर पे उसे साएबाँ समझने लगे

पेड़ के नीचे ज़रा सी छाँव जो उस को मिली

सो गया मज़दूर तन पर बोरिया ओढ़े हुए

किसी को मार के ख़ुश हो रहे हैं दहशत-गर्द

कहीं पे शाम-ए-ग़रीबाँ कहीं दिवाली है