शौकत जमाल के शेर
बोलीं कि काम करने की ख़ूगर नहीं हूँ मैं
बीवी हूँ आप की कोई शौहर नहीं हूँ मैं
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पी गई थी घोल कर 'आज़ाद' की आब-ए-हयात
तब कहीं घर में मिरे तुझ सा पिसर पैदा हुआ
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साक़ी का और शराब का हो ज़िक्र बार बार
ज़ाहिद को भूल कर न कभी पारसा लिखें
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चाहते तो थे मिरे अग़्यार तू पैदा न हो
फिर भी ये हिम्मत है तेरी तू अगर पैदा हुआ
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खाना खुलने का ही एलान अगर फ़रमा दें
हम ये समझेंगे कि तक़रीर-ए-सदारत बख़्शी
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मुमकिन नहीं ग़ज़ब से बचें हम जनाब के
बालिशतियों को भी न अगर सर्व सा लिखें
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फेसबुक ही आज-कल चौपाल है
चौक पर मिलते कहाँ हैं चार दोस्त
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