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सय्यद ग़ुलाम मोहम्मद मस्त कलकत्तवी

1896 - 1941 | कोलकाता, भारत

शेर 3

सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द

रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द

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मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे

कि दाना ख़ाक में मिल कर गुल-ओ-गुलज़ार होता है

a seed has to bite the dust to become a flower

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कुछ दोस्त से उम्मीद अंदेशा-ए-दुश्मन

होगा वही जो कुछ मिरी क़िस्मत में लिखा है

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चित्र शायरी 1

सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द

 

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