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तौहीद ज़ेब के शेर

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रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस कर दें ये जुनूँ-पेशा

ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है

रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस कर दें ये जुनूँ-पेशा

ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है

थोड़ी थोड़ी हमें मोहब्बत थी

और बाक़ी हवस से काम लिया

क्या हुआ हुस्न-ए-जावेदाँ को तिरे

तू तो मुझ से बिछड़ के ख़ुश थी बहुत

उकसा रहा है तर्क-ए-त'अल्लुक़ पे दिल मुझे

जितना भी जल्दी हो सके दोस्त मिल मुझे

गले से लग ज़बाँ को छू कोई ख़्वाहिश भी पूरी कर

दिलासों से कहाँ ग़म की फ़ज़ा तब्दील होती है

अपनी तस्वीर चूम ली उस ने

फूल पर फूल खिल गया जैसे

तेरी नज़र से देखें तो दुनिया हसीन है

लेकिन हमें नज़र भी तो आए तिरी तरह

रुमूज़-ए-वक़्त की पहली क्लास में भी मिरा

तमाम ध्यान था सरकारी नौकरी की तरफ़

ये हुनर ख़ुद कमाया जाता है

'आशिक़ी ख़ून में नहीं होती

हैअत से मावरा है लिसानी जमालियात

पानी का अस्ल ज़ाइक़ा ज़ेर-ए-नमक तो है

सारे रौशन ख़याल बैठे हैं

मज़हबी आदमी का क्या होगा

देखिए मेरी 'उम्र ही क्या है

उन की ख़ुशबू से मैं जवान हुआ

धोका खाने पे रो पड़ा होगा

ये कोई 'इश्क़ में नया होगा

हम जो इज़हार नहीं करते तो इस का मतलब

तू समझता है परेशान नहीं होते हैं

एक ही दिन मिला मोहब्बत को

साल भर की थकन उतारी गई

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