तौहीद ज़ेब के शेर
रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस न कर दें ये जुनूँ-पेशा
ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है
रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस न कर दें ये जुनूँ-पेशा
ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है
क्या हुआ हुस्न-ए-जावेदाँ को तिरे
तू तो मुझ से बिछड़ के ख़ुश थी बहुत
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उकसा रहा है तर्क-ए-त'अल्लुक़ पे दिल मुझे
जितना भी जल्दी हो सके ऐ दोस्त मिल मुझे
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गले से लग ज़बाँ को छू कोई ख़्वाहिश भी पूरी कर
दिलासों से कहाँ ग़म की फ़ज़ा तब्दील होती है
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तेरी नज़र से देखें तो दुनिया हसीन है
लेकिन हमें नज़र भी तो आए तिरी तरह
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रुमूज़-ए-वक़्त की पहली क्लास में भी मिरा
तमाम ध्यान था सरकारी नौकरी की तरफ़
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ये हुनर ख़ुद कमाया जाता है
'आशिक़ी ख़ून में नहीं होती
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हैअत से मावरा है लिसानी जमालियात
पानी का अस्ल ज़ाइक़ा ज़ेर-ए-नमक तो है
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देखिए मेरी 'उम्र ही क्या है
उन की ख़ुशबू से मैं जवान हुआ
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हम जो इज़हार नहीं करते तो इस का मतलब
तू समझता है परेशान नहीं होते हैं
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