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तौहीद ज़ेब के शेर

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रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस कर दें ये जुनूँ-पेशा

ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है

रुख़-ए-‘आलम को पेश-ओ-पस कर दें ये जुनूँ-पेशा

ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े वक़्फ़े से पुकारा है

धोका खाने पे रो पड़ा होगा

ये कोई 'इश्क़ में नया होगा

थोड़ी थोड़ी हमें मोहब्बत थी

और बाक़ी हवस से काम लिया

क्या हुआ हुस्न-ए-जावेदाँ को तिरे

तू तो मुझ से बिछड़ के ख़ुश थी बहुत

उकसा रहा है तर्क-ए-त'अल्लुक़ पे दिल मुझे

जितना भी जल्दी हो सके दोस्त मिल मुझे

गले से लग ज़बाँ को छू कोई ख़्वाहिश भी पूरी कर

दिलासों से कहाँ ग़म की फ़ज़ा तब्दील होती है

हमारी नेकियाँ दरिया का पेट भरती हैं

कोई सिला नहीं मिलना किसी को देखना तुम

अपनी तस्वीर चूम ली उस ने

फूल पर फूल खिल गया जैसे

वो दिन कहाँ गए जब तू ख़ुदा बना हुआ था

बेबसी में ख़ुदा को पुकारने वाले

निज़ाम-ए-ज़िंदगी बिल्कुल अलग तश्कील होता है

ख़ला में रौशनी का ज़ाइक़ा तब्दील होता है

बैठा हुआ हूँ तेरे बराबर मैं इस लिए

तेरी चमक से मेरे सितारे चमक उठें

मैं नक़्श-ए-पा सही मिरी अपनी सड़क तो है

मरकज़ से चाहे दूर हूँ मुझ में चमक तो है

बिखरेगा कितनी देर में शीराज़ा-ए-हयात

आब-ओ-हवा से हो गया अंदाज़ा-ए-हयात

'उम्र गुज़री मगर मोहब्बत में

एक लम्हा भी यादगार नहीं

जहान-ए-ख़ैर-ओ-शर में तज्रबा कैसा रहा अपना

ख़ुदा से गुफ़्तुगू होगी दिलों के राज़ खोलेंगे

हम जो इज़हार नहीं करते तो इस का मतलब

तू समझता है परेशान नहीं होते हैं

दफ़्तर-ए-हुस्न खोले बैठे हैं

'आशिक़ी रोज़गार है उन का

एक ही दिन मिला मोहब्बत को

साल भर की थकन उतारी गई

वीरान तू ने कर दिया घर-बार एहतियात

मैं ने कहा भी था कि मिरे यार एहतियात

तेरी नज़र से देखें तो दुनिया हसीन है

लेकिन हमें नज़र भी तो आए तिरी तरह

रुख़-ए-'आलम को पेश-ओ-पस कर दें ये जुनूँ-पेशा

ख़ुदा ने आदमी को वक़्फ़े-वक़्फ़े से पुकारा है

रुमूज़-ए-वक़्त की पहली क्लास में भी मिरा

तमाम ध्यान था सरकारी नौकरी की तरफ़

बाँझ-पन का सिला मिला उस को

'उम्र भर हुस्न बरक़रार रहा

ये हुनर ख़ुद कमाया जाता है

'आशिक़ी ख़ून में नहीं होती

सारे रौशन-ख़याल बैठे हैं

मज़हबी आदमी का क्या होगा

खुरच कर सीना-ए-मुल्हिद सभी हैरान हैं 'तौहीद'

ख़ुदा आबाद है इक कूचा-ए-वीरान के नज़दीक

किसी बदन की सैर के जुनून में ग़ज़ल हुई

कोई शोर था शर सुकून में ग़ज़ल हुई

अब इस तर्क-ए-त'अल्लुक़ पर किसी को क्या दलाएल दें

ये चादर जब रफ़ू होगी दिलों के राज़ खोलेंगे

हैअत से मावरा है लिसानी जमालियात

पानी का अस्ल ज़ाइक़ा ज़ेर-ए-नमक तो है

थोड़ी थोड़ी हमें मोहब्बत थी

और बाक़ी हवस से काम लिया

सारे रौशन ख़याल बैठे हैं

मज़हबी आदमी का क्या होगा

शु'ऊरी तज्रबे से दिन गुज़ारने वाले

'अजीब लोग हैं नक़लें उतारने वाले

मैं नक़्श-ए-पा सही मिरी अपनी सड़क तो है

मरकज़ से चाहे दूर हों मुझ में चमक तो है

देखिए मेरी 'उम्र ही क्या है

उन की ख़ुशबू से मैं जवान हुआ

किसी मुश्किल घड़ी में हम तुम्हारा साथ छोड़ेंगे

तुम्हें मा'लूम हो जाए बशर क्या है ख़ुदा क्या है

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