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ज़फ़र कमाली

1959 - - | सिवान, भारत

ज़फ़र कमाली के शेर

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निगाहों में जो मंज़र हो वही सब कुछ नहीं होता

बहुत कुछ और भी प्यारे पस-ए-दीवार होता है

जो चाहता है कि बन जाए वो बड़ा शायर

वो जा के दोस्ती गाँठे किसी मुदीर के साथ

शौहरों से बीबियाँ लड़ती हैं छापा-मार जंग

राब्ता उन का भी क्या कश्मीर की वादी से है

जो अपना भाई है रहता है वो पाँव की ठोकर में

मगर जोरू का भाई तो गले का हार होता है

पोपले मुँह से चने खाना नहीं मुमकिन हुज़ूर

नहीं सकती जवानी लौट के माजून से

वही सुलूक ज़माने ने मेरे साथ किया

किया था जैसा मुशर्रफ़ ने बेनज़ीर के साथ

ये रिश्वत के हैं पैसे दिन में कैसे लूँ मुसलमाँ हूँ

मैं ले सकता नहीं सर अपने ये इल्ज़ाम रोज़े में

जो बैठा है बगुला भगत की तरह

वही हम को असली शिकारी लगे

वो मस्जिद हो कि मंदिर हो अदब हो या सियासत हो

वही है जंग कुर्सी की वही दस्तार का झगड़ा

सियासत में ऐसी उछल-कूद है

कि हर एक नेता मदारी लगे

वफ़ूर-ए-इश्क़ के जज़्बे से हो गई सरशार

निकल पड़ी है मुरीदान जदीद पीर के साथ

छिड़ा जब उन के घर झगड़ा तो उन की अक़्ल चकराई

जो सुलझाते रहे थे उम्र-भर बाज़ार का झगड़ा

ख़बर कर दो मोहल्ले में अगर छेड़ा किसी ने भी

उसी दम मैं मचा सकता हूँ क़त्ल-ए-आम रोज़े में

इस ज़माने की अजब तिश्ना-लबी है 'ज़फ़र'

प्यास उस की सिर्फ़ बुझती है हमारे ख़ून से

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