ज़रीफ़ जबलपूरी के शेर
ये तरक़्क़ी का ज़माना है तिरे आशिक़ पर
उँगलियाँ उठती थीं अब हाथ उठा करते हैं
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,ज़रीफ़' अंजाम क्या होगा जो मेरा दिल भी खो जाए
कहीं ऐसा न हो, मुझ को भी फ़िल्मी इश्क़ हो जाए
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बहुत तंग आ गए जब मच्छरों की डंक-मारी से
तो सब शाएर तड़प उट्ठे निहायत बे-क़रारी से
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किसी मच्छर ने बढ़ कर हज़रत-ए-'मख़मूर' को काटा
ख़ुमार उतरा तो छाया आलम-ए-हस्ती में सन्नाटा
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