बूम मेरठी के शेर
उन से छींके से कोई चीज़ उतरवाई है
काम का काम है अंगड़ाई की अंगड़ाई है
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टैग : अंगड़ाई
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शम्अ कुछ फूकने के वास्ते घर पर नहीं जाती
फ़िदा उल्लू का पट्ठा आ के ख़ुद परवाना होता है
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गया बचपन शबाब आया बुढ़ापा आने वाला है
मगर मैं तो अभी तक आप को बच्चा समझता हूँ
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न पूछो तुम को और दुश्मन को दिल में क्या समझता हूँ
उसे उल्लू तुम्हें उल्लू का मैं पट्ठा समझता हूँ
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बूम साहब का अजब रंग निराला देखा
यार यारों में है अग़्यार है अग़्यारों में
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लड़ते ही पहली नज़र जान तसद्दुक़ कर दी
हो गया साथ ही आग़ाज़ के अंजाम मिरा
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बस अब बारह बरस के हो गए ख़त्ना करा डालो
मुसलमानी न हो जिस की मुसलमाँ हो नहीं सकता
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मुख़ालिफ़ पार्टी पिछले मज़ामीनों को रोती है
हमारी शायरी की आज दुनिया और ही कुछ है
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पड़ें जूते हज़ारों सर पे लेकिन मैं न निकलूँगा
तेरे कूचे के हम-सर बाग़-ए-रिज़वाँ हो नहीं सकता
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अगर दिल को बचाता मैं न ज़ुल्फ़ों के अड़ंगे से
तो दुनिया भर से लम्बी शाम-ए-फ़ुर्क़त और हो जाती
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ये हस्ती भी कुछ हस्ती है ये जीना भी कुछ जीना है
दो दिन खाने को मिलता है और दो दिन फ़ाक़े होते हैं
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जो छोटी मोटी क़ौमें हैं दुनिया में मज़ा उड़ाती हैं
जो ख़ानदान के अच्छे हैं भट्टों पे ईंटें ढोते हैं
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दुश्मन की चापलूसी से कुछ फ़ाएदा नहीं
साले को बेवक़ूफ़ बनाए हुए तो हूँ
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ग़ैर जब ख़ल्वत से निकला दौड़ कर मैं ने कहा
दूसरा भी आप का उम्मीदवार आ ही गया
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ले के उस शोख़ को आराम से छत पर सोया
ग़ैर को डाल दिया बाँध के शहतीर के साथ
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ख़ौफ़-ए-बदनामी से गो अक्सर छुपाया जुर्म को
लब पर उन का नाम फिर भी बार बार आ ही गया
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टैग : तंज़-ओ-मिज़ाह
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शराब-ए-नाब की करता मज़म्मत फिर न भूले से
जो मय-ख़ाने में वाइ'ज़ की मरम्मत और हो जाती
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