इन्तिज़ार हुसैन के लेख
अदब और इश्क़
एक बादशाह ने एक मलिका के हुस्न-ओ-जमाल का चर्चा सुना और उस पर आशिक़ हो गया। फिर वह तख़्त-ओ-ताज छोड़कर उस अजनबी मुल्क की तरफ़ उस मलिका का दीदार करने चला। मगर इस बादशाह से ज़्यादा कमाल शहज़ादा जान-ए-आलम ने दिखाया जो एक तोते की बातों में आकर अंजुमन आरा का
इंतिज़ार हुसैन का फ़न: मुतहर्रिक ज़हन का सय्याल सफ़र
इंतज़ार हुसैन इस दौर के सबसे अहम अफ़साना निगारों (कहानीकारों) में से हैं। अपनी प्रभावशाली प्रतीकात्मक शैली के ज़रिए उन्होंने उर्दू अफ़साने को नई कलात्मक और अर्थ संबंधी संभावनाओं से परिचित कराया है और उर्दू अफ़साने का रिश्ता एक साथ दास्तान, हिकायत (कथा),
नॉवेल, हक़ीक़त-निगारी और ग़ालिब
यह सही है कि उर्दू में नॉवेल की बुनियाद डिप्टी नज़ीर अहमद ने डाली और कहानी के जनक मुंशी प्रेमचंद हैं। फिर भी मेरा यह कहने को जी चाहता है कि नए उर्दू फ़िक्शन का इतिहास ग़ालिब से शुरू होना चाहिए। यूँ भी कहा जा सकता है कि हमारे साहित्य में ग़ालिब का व्यक्तित्व
गुमशुदा अमीर ख़ुसरो
गुमशुदा अमीर खुसरो अमीर खुसरो अपने ज़माने में एक अमीर खुसरो थे। हमारे ज़माने तक आते-आते एक से कई बन गए। व्यापक और संपूर्ण शख्सियतों के साथ मुश्किल यही तो होती है कि कल्पना में उनका एक साथ समाना मुश्किल होता है। उधर वह आदमी बहुत फैला हुआ था। इधर दिन-ब-दिन
नया अदब और पुरानी कहानियाँ
अलीगढ़ में केले का एक बाग़ था। तवायफ़ों की रस्म थी कि हर शब-ए-आशूर को इस बाग़ में केले का पत्ता तोड़ने जाती थीं। एक साल शहर में दंगा हो गया। बाग़ के हिंदू मालिक ने लठ-बंद जाट बिठा दिए कि शब-ए-आशूर को वहाँ कोई क़दम न रखे। इस पर वह रस्म जो तवायफ़ों के
अलामतों का ज़वाल
मशहूर अंग्रेज़ इतिहासकार मिस्टर गिबन ने कहा है कि दुनिया में दो बड़े पहलवान गुज़रे हैं। रुस्तम और हज़रत अली... मुझे नहीं मालूम कि गिबन ने वाक़ई यह बात कही है या नहीं, इसके रावी (सुनाने वाले) हमारी बस्ती के ज़ाकिर साहब हैं जो मजलिस में गर्मी पैदा करने
इज्तेमाई तहज़ीब और अफ़साना
सामूहिक तहज़ीब और अफ़साना इंतज़ार हुसैन एक रोज़ का ज़िक्र है कि लाहौर के आसमान पर एक दूधिया धारी खिंचती दिखाई दी। ग़ौर से देखा तो बहुत ऊंचाई पर एक गोल सी चीज़ चलती नज़र आई। यह लंबी दूधिया धारी उसी की दुम थी। शहर में यह ख़बर उड़ गई कि स्पुतनिक गुज़र
अदब की अलिफ़, बे, ते
मेरी नानी अम्माँ ने तो ख़ैर मुग़लों का सिक्का भी देखा था मगर मैंने बचपन में बस दो सिक्के देखे। मलिका की इकन्नी जो बहुत घिस गई थी और जॉर्ज पंचम का चमकदार और उभरी मूरत वाला पैसा। अब ये दोनों सिक्के टकसाल से बाहर हैं। हालाँकि 'अज़ीम इंसान' (महान इंसान)
वापस क्लासिकियत की तरफ़
ग़ालिब को आम तौर पर उर्दू का सबसे मुश्किल शायर समझा जाता है। उनके ज़्यादातर अशआर (शेर) समझ से बाहर और अस्पष्ट माने जाते हैं जो अदीबों (साहित्यकारों) और आलोचकों को गहरे विश्लेषण और अध्ययन पर मजबूर करते हैं। ग़ालिब की ज़्यादातर व्याख्याएं ऐसी हैं मानो
सज्जाद ज़हीर का नज़रिया-ए-अदब
हमारे बुज़ुर्ग ख़त लिखते हुए आमतौर पर इस जुमले पर उसे ख़त्म करते थे। बरख़ुरदार, इस थोड़े लिखे को बहुत समझ और अपनी ख़ैरियत और हालात तफ़सील (विस्तार) से लिख। ख़तों में लिखा जाने वाला यह रस्मी जुमला इस वक़्त जब मैं सज्जाद ज़हीर की तहरीरें पढ़ रहा हूँ,