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ग़ज़ल
उजाड़ मौसम में रेत-धरती पे फ़स्ल बोई थी चाँदनी की
अब उस में उगने लगे अँधेरे तो कैसा जी में मलाल रखना
एज़ाज़ अहमद आज़र
ग़ज़ल
फ़स्ल बोई जाएगी सुनते हैं अब मिर्रीख़ पर
दूरियाँ यूँ बढ़ रही हैं खेत से खलियान से
अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी
ग़ज़ल
शब-ए-फ़ुर्क़त में जितने ख़्वाब भी मिलने के देखे थे
अगर ता'बीर मिलती तो उजाला हो गया होता






