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मुन्नी बाई हिजाब

1860 | कोलकाता, भारत

ग़ज़ल 1

 

शेर 2

दिल बहुत बेचैन बे-आराम है

क्या मोहब्बत का यही अंजाम है

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कहूँगा दावर-ए-महशर कर दिया जाए

कि उम्र भर उसी काफ़िर को मैं ने प्यार किया

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