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ग़ज़ल
दिल की तसल्ली जब कि होगी गुफ़्त ओ शुनूद से लोगों की
आग फुंकेगी ग़म की बदन में उस में जलिए भुनिएगा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
कौन सा वो जादू है जिस से ग़म की अँधेरी सर्द गुफा में
लाख निसाई साँस दिलों के रोग मिटाने आ जाते हैं
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
है बुल-अजब ये ज़मज़मा-ए-सौत-ए-सरमदी
किस तरह आए मा'रिज़-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद में
पंडित जवाहर नाथ साक़ी
नज़्म
इसे कहना
उसे कहना दिसम्बर आ गया है
दिसम्बर के गुज़रते ही बरस इक और माज़ी की गुफा में डूब जाएगा
अर्श सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
अल्लाह मिरा ग़फ़ूर मोहम्मद मिरे शफ़ीअ'
'माइल' को ख़ौफ़ कुछ नहीं रोज़-ए-शुमार का






