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ग़ज़ल
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
इल्म-ए-मूसा भी है तिरे सामने हैरत-फ़रोश
छोड़ कर आबादियाँ रहता है तू सहरा-नवर्द
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़ौक़ ओ शौक़
तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शब
मुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!






