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हास्य
जो पिक-अप करता रहे प्यार की बाँहों में मुझे
देख सकता हो जो अग़्यार की बाँहों में मुझे
साग़र ख़य्यामी
नज़्म
कल की बात
तक़्वियत ज़ेहन ने दी ठहरो नहीं ख़ून नहीं
पान की पीक है ये अम्माँ ने थूकी होगी
अख़्तरुल ईमान
ग़ज़ल
पान जो हाथ से कल ग़ैर के तू ने खाया
पी के लोहू को ग़रज़ घूँट रहे हम जूँ पीक
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
पीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोई
बोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोई
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
पी जा अय्याम की तल्ख़ी को भी हँस कर 'नासिर'
ग़म को सहने में भी क़ुदरत ने मज़ा रक्खा है




