aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "برکات"
रज़ा लखनवी
1896 - 1978
शायर
राही कुरैशी
born.1934
बरकत अली फिराक
मसूद अहमद बरकाती
लेखक
सय्यद बरकातुल हसन असकर
बरकतुल्लाह पेमी
1660 - 1729
सय्यद बरकात अहमद
सय्यद शाह बरकात हसन
मजलिस-ए-बरकात अल-जामितुल अशरफया, आजमगढ़
पर्काशक
मरकज़ तहरीक बरकात इमाम शाफ़ई, रायगढ़
बरकात पब्लिकेशंज़, हैदराबाद
मतबा बरकात-ए-अहमदी, इलाहाबाद
मर्कज़-ए-अहल-ए-सुन्नत बरकात रज़ा, पोरबन्दर
ऑनलाइन इशाअ'त बराए बरकात लाइब्रेरी
बरकात अकेडमी, कराची
तक़रीर का लुब्ब-ए-लुबाब ये होता है कि राक़िम-उल-हरूफ़ जान-बूझ कर अपनी तंदुरुस्ती के पीछे हाथ धो कर पड़ा है। मैं उन्हें यक़ीन दिलाता हूँ कि अगर ख़ुदकुशी मेरा मंशा होता तो यूं एड़ियां रगड़ रगड़ कर नहीं जीता, बल्कि आँख बंद कर के उनकी तजवीज़ करदा दवाएं खा लेता। आईए,...
“क़ीमत?” मौलवी अबुल ने अब के हाज़िरीन की तरफ़ नहीं देखा सिर्फ़ जेब में हाथ डाल लिया। शमीम अहमद मारे एहतिराम के सिमटने लगा। एक लम्हे तक हाथ मलता रहा, खंखारा और बोला, छः रुपये गज़ के हिसाब से बयालिस रुपये हुए क़िब्ला!" दुकान में सजे हुए सब थान जैसे...
واقعہ یہ ہے کہ اقبالؔ نے مزدوروں کی حکومت کے ابتدائی دور کو دیکھ کر جو رائے قائم کی تھی وہ بہت اچھی نہیں تھی۔ جاویدنامہ میں جمال الدین افغانی کی زبان سے انہوں نے اشتراکیت کے متعلق جو کچھ کہا ہے وہ اس سوء ظن کی بنا پر ہے۔...
बिस्तर पर मौजूद रहे और सैर-ए-हफ़्त-अफ़्लाकऐसी किसी पर रहमत की बरसात नहीं देखी
ताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयात
बारिश का लुत्फ़ या तो आप भीग कर लेते होंगे या बालकनी में बैठ कर गिरती हुई बूँदों और चमकदार आसमान को देखकर, लेकिन क्या आपने ऐसी शायरी पढ़ी है जो सिर्फ बरसात ही नहीं बल्कि बे-मौसम भी बरसात का मज़ा देती हो? यहाँ हम आप के लिए ऐसी ही शायरी पेश कर रहे हैं जो बरसात के ख़ूबसूरत मौसम को मौज़ू बनाती है। इस बरसाती मौसम में अगर आप ये शायरी पढ़ेंगे तो शायद कुछ ऐसा हो, जो यादगार हो जाएगी।
मेहमान के हवाले से हिन्दुस्तानी तहज़ीबी रिवायात में बहुत ख़ुश-गवार तसव्वुरात पाए जाते हैं। मेहमान का आना घर में बरकत का और ख़ुशहाली का शगुन समझा जाता है। ये शायरी मेहमान की इस जहत के साथ और बहुत सी जहतों को मौज़ू बनाती है। मेहमान के क़याम की आरिज़ी नौइयत को भी शाइरों ने बहुत मुख़्तलिफ़ ढंग से बरता है। आप हमारे इस इंतिख़ाब में देखेंगे कि मेहमान का लफ़्ज़ किस तरह ज़िंदगी की कसीर सूरतों के लिए एक बड़े इस्तिआरे की शक्ल में धुल गया है।
बरकातبَرَکات
दिव्य आशीर्वाद, समृद्धि
बा-बरकातبا بَرکات
blessed, lucky, prosperous, happy
महल्ल-ए-बरकातمَحَلِّ بَرکات
برکت یا جزا کی جگہ یا موقع
Barkaat-e-Ramazan
मोहम्मद मंज़ूर नोमानी
इस्लामियात
Yadon Ki Barat
जोश मलीहाबादी
आत्मकथा
Bachhiya Kahani
कहानी
Barkat-ul-Auliya
सय्यद इमामुद्दीन अहमद
Barkaat-e-Maarhra
तुफ़ैल अहमद सिद्दीक़ी बदायूनी
औषधि
Barkaat-e-Ramzaan
Barakatul Auliya
सय्यद इमामुद्दीन अहमद नक़वी गुलशन आबादी
उपदेश
Farhang-e-Kulliyat-e-Meer
फरीद अहमद बरकाती
शब्द-कोश
Barkatid Dua
Mirza Ghulam Ahmad Qadiyani
Nazneen
Kalma e Tayyaba Ki Barkat Aur Durood Shareef Ki Fazilat
अहमद मुस्तफ़ा सिद्दीक़ी राही
नात
Yadon Ki Barat Ka Khususi Mutala
साबिर कमाल
Tableegh-e-Islam Zameen Ke Kinaron Tak
Barakat-ul-Imdad Li-Ahl-il-Istimdad
इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी
शोध / समीक्षा
“अस्सलामु-अ'लैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातहु” इस मुतशर्रे सलाम के जवाब में हमने सिर्फ़ वअ'लैकुम-अस्सलाम कहा जो बहुत ना काफ़ी महसूस हुआ। हमें ज़रा शक सा था कि वअ'लैकुम-अस्सलाम के साथ भी बरकातहु वग़ैरा लग सकते हैं या नहीं, वर्ना जी तो चाहा के सलाम का दमदार सितारा बना कर पेश...
बस इक शराब-ए-कुहन के करिश्मे हैं साक़ीनए ज़माने नई मस्तियाँ नई बरसात
پینتیس اور چالیس کے درمیان کی عمر، نووجب (چھ فٹ۔ مرتب) سے کچھ نکلتا ہوا قد، بڑی بڑی غلافی آنکھیں، گہرا سانولا رنگ، کشن چند اخلاص کا چہرہ ڈاڑھی سے بےنیاز تھا۔ متوسط گھنی مونچھیں البتہ اس کے دہانے کے دونوں جانب تک ڈھلکی ہوئی تھیں۔ ڈھلکی ہوئی مونچھوں نے...
اس طرح پورے بارہ سال گذر گئے اور تب دیوی خوش ہوئیں۔ رات کا وقت تھا، چاروں طرف خموشی چھائی ہوئی تھی۔ مندر میں ایک دھندھلا سا گھی کا چراغ جل رہا تھا۔تارا درگا کے پیروں پر سر رکھے التجاءِ صادق میں غرق تھی کہ یکایک اسے دیوی کے تنِ...
وقتِ سحر وقتِ مناجات ہے خیز دراں وقت کہ برکات ہے...
हम रूसी लोग अपनी हक़ीक़त और हालत को समझने की ज़्यादा अहलियत रखते हैं मुझे उस नौजवान का वाक़िया ब-ख़ूबी याद है, जो मुझसे गुज़िश्ता मौसम-ए-सरमा में मिलने आया था। हमें एक किसान के घर जाने का इत्तिफ़ाक़ हुआ। उस घर में हर तरफ़ मैली कुचैली चीज़ें बिखरी हुई थीं।...
باعثِ برکاتِ لامحدود ہے کس قدر برجستہ ہے تاریخ بھی...
देबल में आज मातम बपा है, हर तरफ़ हुज़न-ओ-मलाल के आसार नमूदार हैं और हर शख़्स बेताब-ओ-मुज़्तरिब है, दुकानें बंद हैं, बाज़ार की चहल पहल मौक़ूफ़ है और लोग परेशान हैं कि उन्हें अब ऐसा हुक्मरान क्योंकर नसीब होगा, दुनिया में कौन ऐसा है जो उनके साथ इस रवादारी को...
“उन दिनों में क्या अनोखी बात होगी। एक बादशाह न रहे और तो सब कुछ वही है। वही शहर वाले, वही महबूब-ए-इलाही का मज़ार।” “अब मैं आपसे क्या कहूँ। बस ये समझ लो कि दूल्हा से बरात होती है। फिर दिल्ली के वो दिल वाले और शौक़ीन जेवड़े कहाँ रहे।”...
لیکن اس کے ساتھ ہی میری بات پوری نہ ہوگی اگر میں ایک اور نقطہ نظر سے اس حقیقت کا اظہار نہ کروں کہ اکبر اور اقبال جس حد تک مغربی تہذیب سے متاثر ہیں، اسی حد تک وہ ہند اسلامی تہذیب میں تبدیلی کا دروازہ بھی کھولتے ہیں۔ اکبر...
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