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नज़्म
ग़ालिब
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
गुलज़ार
तंज़-ओ-मज़ाह
अपने बेख़्वाब घरौंदे ही को वापस लौटो अब यहां कोई नहीं कोई नहीं आएगा...
कन्हैया लाल कपूर
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तंज़-ओ-मज़ाह
कन्हैया लाल कपूर
ग़ज़ल
हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं
अब और न बिखरे रिश्तों की बोसीदा किताब तो अच्छा हो