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ग़ज़ल
ये लोग वफ़ा के हामी थे नामूस-ओ-हया के हामी थे
बस एक रसूल के क़ाइल बस एक ख़ुदा के हामी थे
सईद अहमद अख़्तर
नज़्म
झूठ
तुम्हारे जजाने के ब-बा’द अपना ख़याल रखूँगा
दे-देखो ना कैसे मुस-मुस्कुरा रा-रहा हूँ
शाहबाज़ मेहतिर
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ग़ज़ल
तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है
तेरे साथ तिरी याद आई क्या तू सच-मुच आई है
जौन एलिया
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ये हम जो हैं हमारी भी तो होगी कोई नौटंकी
हमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगा
जौन एलिया
ग़ज़ल
ऐ बर्क़-ए-तजल्ली कौंध ज़रा क्या मुझ को भी मूसा समझा है
मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाए









