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नज़्म
इंतिसाब
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है
जिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
तुझ से दूरी दूरी कब थी पास और दूर तो धोका हैं
फ़र्क़ नहीं अनमोल रतन को खो कर फिर से पाने में
मीराजी
ग़ज़ल
एक निगाह का सन्नाटा है इक आवाज़ का बंजर-पन
मैं कितना तन्हा बैठा हूँ क़ुर्बत के वीराने में
अज़्म बहज़ाद
नज़्म
ग़ालिब
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
गुलज़ार
ग़ज़ल
हमारे और तुम्हारे वास्ते में इक नया-पन था
मगर दुनिया पुरानी है न तुम समझे न हम समझे
सबा अकबराबादी
ग़ज़ल
मैं दश्त हूँ ये मुग़ालता है न शाइ'राना मुबालग़ा है
मिरे बदन पर कहीं क़दम रख के देख नक़्श-ए-क़दम बनेगा
उमैर नजमी
नज़्म
नज़्म
तिरी तलब का सबब सिर्फ़ ख़ाली-पन तो नहीं
कि तुझ से राब्ता मेरा ज़रूरतन तो नहीं
बालमोहन पांडेय
नज़्म
मुफ़्लिसी
मुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन पर
देता है अपनी जान वो एक एक नान पर








