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नज़्म
इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर
फिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबीं
किया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ को
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रामायण का एक सीन
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूर
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
मिरी रात मुंतज़िर है किसी और सुब्ह-ए-नौ की
ये सहर तुझे मुबारक जो है ज़ुल्मतों की मारी
आमिर उस्मानी
उद्धरण
गाली, गिन्ती, सरगोशी और गंदा लतीफ़ा तो सिर्फ़ अपनी मादरी ज़बान में ही मज़ा देता है।...
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
नज़्म
हिण्डोला
मैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारी
करोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ा






