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ग़ज़ल
तख़्ता-ए-आब-ए-चमन क्यूँ न नज़र आवे सपाट
याद आवे मुझे जिस दम वो निगम्मूद का घाट
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं
वो जो नज़र से है निहाँ उस का जहाँ है तू कि मैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
सिकंदर हूँ तलाश-ए-आब-ए-हैवाँ रोज़ करता हूँ
अभी नक़्श-ओ-निगार-ए-ज़िंदगी में रंग भरता हूँ
फ़रीद परबती
ग़ज़ल
कुछ तो कर दरिया मिरे इन को डुबो या पार कर
कश्तियों ने अपना दुख आब-ए-रवाँ पर लिख दिया









