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परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

1866 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 42

शेर 38

आबदीदा हो के वो आपस में कहना अलविदा'अ

उस की कम मेरी सिवा आवाज़ भर्राई हुई

वो ही आसान करेगा मिरी दुश्वारी को

जिस ने दुश्वार किया है मिरी आसानी को

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गर आप पहले रिश्ता-ए-उल्फ़त तोड़ते

मर मिट के हम भी ख़ैर निभाते किसी तरह

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पुस्तकें 3

दीवान-ए-प्रवीन

 

 

दीवान-ए-प्रवीन

 

 

दीवान-ए-प्रवीन

 

1913

 

ऑडियो 5

करेंगे ज़ुल्म दुनिया पर ये बुत और आसमाँ कब तक

किसी की किसी को मोहब्बत नहीं है

न आया कर के व'अदा वस्ल का इक़रार था क्या था

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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