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रसा रामपुरी

1874 - 1913 | रामपुर, भारत

रसा रामपुरी

ग़ज़ल 14

शेर 4

वो ख़ुश किसी के साथ हैं ना-ख़ुश किसी के साथ

हर आदमी की बात है हर आदमी के साथ

बअ'द-ए-फ़ना भी ख़ैर से तन्हा नहीं हैं हम

बंदों से छुट गए तो फ़रिश्तों में मिले

आए अगर क़यामत तो धज्जियाँ उड़ा दें

फिरते हैं जुस्तुजू में फ़ित्ने तिरी गली के

बड़ी ही धूम से दावत हो फिर तो ज़ाहिद की

ये मय जो चार घड़ी को हलाल हो जाए

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