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मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

रामपुर, भारत

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल के संपूर्ण

ग़ज़ल 17

शेर 32

बा'द मरने के मिरी क़ब्र पे आया 'ग़ाफ़िल'

याद आई मिरे ईसा को दवा मेरे बा'द

लैलतुल-क़द्र है हर शब उसे हर रोज़ है ईद

जिस ने मय-ख़ाने में माह-ए-रमज़ाँ देखा है

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वो सुब्ह को इस डर से नहीं बाम पर आता

नामा कोई बाँध दे सूरज की किरन में

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के सज्जादा-नशीं क़ैस हुआ मेरे ब'अद

रही दश्त में ख़ाली मिरी जा मेरे ब'अद

हक़्क़-ए-मेहनत उन ग़रीबों का समझते गर अमीर

अपने रहने का मकाँ दे डालते मज़दूर को

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पुस्तकें 1

Deewan-e-Ghafil

 

1872

 

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