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अब्दुल वहाब सुख़न

1970 | रामपुर, भारत

ग़ज़ल 27

शेर 6

ये प्यार का जज़्बा तिरे कुछ काम तो आए

मेरा नहीं बनता है तो बन और किसी का

ये सानेहा भी हो गया है रस्ते में

जो रहनुमा था वही खो गया है रस्ते में

किताब-ए-दिल का मिरी एक बाब हो तुम भी

तुम्हें भी पढ़ता हूँ मैं इक निसाब की सूरत

नए हैं वस्ल के मौसम मोहब्बतें भी नई

नए रक़ीब हैं अब के अदावतें भी नई

जला दिए हैं किसी ने पुराने ख़त वर्ना

फ़ज़ा में ऐसा तो रक़्स-ए-शरर नहीं होता

पुस्तकें 1

Nai Rut Ka Safar

 

2014

 

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