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निज़ाम रामपुरी

1819 - 1872 | रामपुर, भारत

ग़ज़ल 53

शेर 61

अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो

और ये भी देखते हैं कोई देखता हो

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अंगड़ाई भी वो लेने पाए उठा के हाथ

देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ

है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम

मैं ये क्यूँ पूछूँ कब मिलेंगे आप

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पुस्तकें 3

Nizam Rampuri Hayat Aur Shayari

 

1998

Nizam Rampuri, Hayat Aur Shairi

 

1998

Nizam Rampuri: Zindagi, Fan Aur Intikhab-e-Kulliyat

 

1975

 

चित्र शायरी 2

है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम मैं ये क्यूँ पूछूँ कब मिलेंगे आप

 

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