ग़ज़ल 15

शेर 13

हौसला सब ने बढ़ाया है मिरे मुंसिफ़ का

तुम भी इनआम कोई मेरी सज़ा पर लिख दो

अब मुझ से सँभलती नहीं ये दर्द की सौग़ात

ले तुझ को मुबारक हो सँभाल अपनी ये दुनिया

अब उस मक़ाम पे है मौसमों का सर्द मिज़ाज

कि दिल सुलगने लगे और दिमाग़ जलने लगे

पुस्तकें 2

Rahe Ye Rah Guzar-e-Shauq

 

1999

Rahe Ye Rahguzar-e-Shauq

 

1999

 

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