फ़रहान सालिम

ग़ज़ल 15

शेर 13

हौसला सब ने बढ़ाया है मिरे मुंसिफ़ का

तुम भी इनआम कोई मेरी सज़ा पर लिख दो

अब उस मक़ाम पे है मौसमों का सर्द मिज़ाज

कि दिल सुलगने लगे और दिमाग़ जलने लगे

अब मुझ से सँभलती नहीं ये दर्द की सौग़ात

ले तुझ को मुबारक हो सँभाल अपनी ये दुनिया

यूँ भी किया है हम ने हक़-ए-दिलबरी अदा

अपनी ही जीत अपने ही हाथों से हार दी

हूँ वारदात का ऐनी गवाह मैं मुझ से

ये मेरी मौत से पहले मिरा बयाँ ले लो

पुस्तकें 3

Lan-Tarani

 

2018

Rahe Ye Rah Guzar-e-Shauq

 

1999

Rahe Ye Rahguzar-e-Shauq

 

1999

 

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